नेतन्याहू के एक कॉल ने कैसे बिगाड़ा मिडिल ईस्ट का खेल और ईरानी मंत्री के आरोपों की कड़वी सच्चाई

नेतन्याहू के एक कॉल ने कैसे बिगाड़ा मिडिल ईस्ट का खेल और ईरानी मंत्री के आरोपों की कड़वी सच्चाई

ईरान और इजरायल के बीच छिड़ी जुबानी जंग अब एक ऐसे मोड़ पर है जहाँ कूटनीति की दीवारें दरकती नजर आ रही हैं। ईरानी विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने हाल ही में एक ऐसा दावा किया जिसने अंतरराष्ट्रीय गलियारों में हलचल मचा दी। उनका सीधा आरोप है कि इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के एक फोन कॉल ने उस शांति प्रक्रिया या बातचीत के रास्ते को तबाह कर दिया जो शायद क्षेत्रीय तनाव को कम कर सकता था। यह सिर्फ एक बयान नहीं है। यह मिडिल ईस्ट की उस उलझी हुई बिसात का हिस्सा है जहाँ हर चाल के पीछे गहरी साजिश और अस्तित्व की लड़ाई छिपी है।

जब हम युद्ध की बात करते हैं, तो अक्सर मिसाइलों और ड्रोन्स की गिनती होती है। मगर असली खेल उन बंद कमरों में होता है जहाँ एक कॉल पूरी दुनिया का नक्शा बदलने की ताकत रखता है। अराघची का इशारा उस दखल की तरफ है जिसने सीजफायर या किसी भी तरह के समझौते की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। क्या वाकई एक फोन कॉल में इतनी ताकत थी? या ये सिर्फ ईरान की तरफ से अपनी रणनीतिक विफलताओं को ढकने का एक जरिया है? सच शायद इन दोनों के बीच कहीं खड़ा है।

अराघची के सनसनीखेज दावे के पीछे की असली कहानी

ईरानी विदेश मंत्री का कहना है कि जब कुछ अरब देश और पश्चिमी ताकतें तनाव कम करने की कोशिश में जुटे थे, तब नेतन्याहू ने सीधे हस्तक्षेप किया। अराघची ने साफ शब्दों में कहा कि इजरायल नहीं चाहता कि इस क्षेत्र में कभी शांति हो। उनके मुताबिक, इजरायल की सुरक्षा उसकी आक्रामकता पर टिकी है। ईरान के लिए ये फोन कॉल सिर्फ एक बातचीत नहीं बल्कि एक 'डिप्लोमैटिक ब्लास्ट' जैसा था जिसने हफ्तों की मेहनत को शून्य कर दिया।

ईरान इस समय एक अजीब दबाव में है। एक तरफ उसकी अर्थव्यवस्था प्रतिबंधों से जूझ रही है, तो दूसरी तरफ हिजबुल्लाह और हमास जैसे उसके प्रॉक्सी गुट बैकफुट पर हैं। ऐसे में अराघची का यह बयान दुनिया को यह दिखाने की कोशिश है कि ईरान तो बातचीत चाहता है, मगर 'जंगखोर' इजरायल उसे मजबूर कर रहा है। इजरायल ने हमेशा की तरह इन दावों को तवज्जो नहीं दी। उनके लिए ईरान एक ऐसा खतरा है जिसे बातों से नहीं, बल्कि ताकत से ही रोका जा सकता है।

नेतन्याहू की फोन कॉल डिप्लोमेसी और रणनीतिक दबाव

नेतन्याहू कोई नौसिखिया खिलाड़ी नहीं हैं। वो दशकों से सत्ता के केंद्र में हैं और जानते हैं कि कब किसे और कैसे प्रभावित करना है। अगर अराघची के दावों में थोड़ी भी सच्चाई है, तो ये कॉल मुमकिन है कि किसी बड़े यूरोपीय नेता या अमेरिकी अधिकारी को गया हो। इजरायल का तर्क सीधा है। वो किसी भी ऐसे समझौते को नहीं मानेगा जो ईरान को परमाणु ताकत बनने या उसके प्रॉक्सीज को फिर से खड़ा होने का मौका दे।

इजरायली प्रधानमंत्री का रुख हमेशा से सख्त रहा है। उनके लिए शांति का मतलब ईरान की पूरी तरह से घेराबंदी है। जब भी मिडिल ईस्ट में सीजफायर की बात उठती है, नेतन्याहू अपनी शर्तों को इतना कड़ा कर देते हैं कि सामने वाला पक्ष अपने आप पीछे हट जाए। इसे आप कूटनीतिक कुशलता कहें या हठधर्मिता, पर इसने ईरान को चिढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अराघची का गुस्सा इसी बेबसी से निकला है।

क्या युद्ध की आग को जानबूझकर हवा दी जा रही है

मिडिल ईस्ट का संकट अब गाजा या लेबनान तक सीमित नहीं रहा। ये सीधे तौर पर तेहरान बनाम यरूशलेम बन चुका है। ईरान ने पिछले महीनों में जिस तरह से सीधे इजरायल पर मिसाइलें दागीं, उसने पुरानी 'छाया युद्ध' (Shadow War) की परंपरा को तोड़ दिया। अब सब कुछ खुलेआम है। अराघची के आरोपों से पता चलता है कि ईरान को अब डर है कि इजरायल का अगला कदम उसकी संप्रभुता के लिए और भी घातक हो सकता है।

  • इजरायल के पास एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम है।
  • ईरान की मिसाइल तकनीक प्रभावशाली है पर उसे जमीन पर उतारना भारी पड़ रहा है।
  • अमेरिका का इजरायल को अटूट समर्थन ईरान की सबसे बड़ी सिरदर्द है।

ईरानी विदेश मंत्री का यह आरोप कि एक कॉल ने बात बिगाड़ी, दरअसल उनके अपने खेमे की कमजोरी को भी दर्शाता है। अगर आपकी कूटनीति इतनी कमजोर है कि एक फोन कॉल उसे हिला दे, तो सवाल आपकी अपनी पकड़ पर भी उठते हैं। इजरायल ने बार-बार दिखाया है कि वो अंतरराष्ट्रीय दबाव की परवाह किए बिना अपने लक्ष्यों को पूरा करेगा।

क्षेत्रीय ताकतों का बदलता रुख

सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देश इस पूरे विवाद को बहुत बारीकी से देख रहे हैं। उन्हें पता है कि अगर ईरान और इजरायल के बीच पूर्ण युद्ध छिड़ा, तो इसकी तपिश उनके तेल कुओं और चमकते शहरों तक भी पहुंचेगी। अराघची का बयान इन अरब देशों के लिए एक चेतावनी भी है कि इजरायल पर भरोसा करना उन्हें महंगा पड़ सकता है। मगर हकीकत ये है कि अब कई अरब देश ईरान के बढ़ते प्रभाव से ज्यादा डरते हैं।

ईरान इस समय अलग-थलग पड़ता दिख रहा है। रूस अपने युद्ध में व्यस्त है और चीन सिर्फ व्यापारिक हितों की बात करता है। ऐसे में अराघची का 'विक्टिम कार्ड' खेलना एक सोची-समझी रणनीति है। वो चाहते हैं कि दुनिया नेतन्याहू को एक विलेन की तरह देखे जो शांति के रास्ते में कांटा बना हुआ है। पर क्या दुनिया इस कहानी को खरीदेगी? शायद नहीं, क्योंकि ईरान का अपना रिकॉर्ड भी दूध का धुला नहीं है।

प्रोपेगेंडा की जंग और जमीनी हकीकत

युद्ध सिर्फ बमों से नहीं, बल्कि शब्दों से भी लड़ा जाता है। अराघची का ये दावा कि नेतन्याहू ने शांति की संभावनाओं को 'हाइजैक' कर लिया, इसी सूचना युद्ध का हिस्सा है। ईरान जानता है कि वो पारंपरिक युद्ध में इजरायल और अमेरिका के गठबंधन को नहीं हरा सकता। इसलिए वो धारणा बनाने की कोशिश कर रहा है। वो ग्लोबल साउथ और मुस्लिम जगत में अपनी पैठ मजबूत करना चाहता है।

इजरायल की तरफ से आने वाली प्रतिक्रियाएं साफ करती हैं कि वो ईरान को कोई रियायत देने के मूड में नहीं हैं। नेतन्याहू ने बार-बार कहा है कि वो ईरान के "सांप का सिर" कुचलने के लिए तैयार हैं। ऐसी स्थिति में फोन कॉल की बात महज एक छोटी घटना लगती है, जबकि असली समस्या दशकों पुराना अविश्वास और कट्टर दुश्मनी है। अराघची के आरोप सिर्फ इस दुश्मनी की आग में घी डालने का काम कर रहे हैं।

ईरान को अब ये समझना होगा कि केवल आरोपों से काम नहीं चलेगा। अगर उन्हें वाकई शांति चाहिए, तो उन्हें अपने जमीनी ऑपरेशन्स और प्रॉक्सी सपोर्ट पर लगाम लगानी होगी। वहीं इजरायल को ये सोचना होगा कि क्या सिर्फ सैन्य ताकत से वो हमेशा के लिए सुरक्षित रह पाएगा? एक फोन कॉल से बात बिगड़ने का दावा इस बात का सबूत है कि इस इलाके में भरोसा पूरी तरह खत्म हो चुका है।

क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अब केवल बयानों से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने की जरूरत है। ईरान अपनी खोई हुई साख बचाना चाहता है और इजरायल अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है। इन दोनों के बीच फंसा हुआ है आम इंसान, जिसे इस हाई-प्रोफाइल डिप्लोमेसी और फोन कॉल्स के पीछे की राजनीति से सिर्फ बर्बादी ही मिल रही है। अराघची के आरोपों ने एक बात तो साफ कर दी है कि आने वाले दिन और भी तनावपूर्ण होने वाले हैं।

ईरान और इजरायल के इस संकट को समझने के लिए आपको केवल हेडलाइंस नहीं देखनी चाहिए। इसके पीछे की उस कूटनीति को समझना होगा जहाँ एक शब्द भी मिसाइल जितना घातक हो सकता है। अराघची का बयान इसी कड़वी हकीकत का एक छोटा सा हिस्सा है। फिलहाल की स्थिति को देखते हुए, किसी भी तरह के समझौते की उम्मीद करना बेमानी लगता है। अब सारा खेल इस पर टिका है कि कौन अपनी बात पर अड़ा रहता है और कौन झुकता है।

RY

Riley Yang

An enthusiastic storyteller, Riley Yang captures the human element behind every headline, giving voice to perspectives often overlooked by mainstream media.